आरती संग्रह

श्रीगणेश आरती- सुखकर्ता दुखहर्ता

सुखकर्ता दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची। नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची।

सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची। कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती। दर्शनमात्रे मन कामनांपुरती॥ जय देव…

रत्नखचित फरा तूज गौरीकुमरा। चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा।

हिरेजड़ित मुकुट शोभतो बरा। रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरीया॥ जय देव…

लंबोदर पीतांबर फणीवर बंधना। सरळ सोंड वक्रतुण्ड त्रिनयना।

दास रामाचा वाट पाहे सदना। संकष्टी पावावें, निर्वाणी रक्षावे,

सुरवरवंदना॥ जय देव…

 

घालीन लोटांगण
घालीन लोटांगण, वंदीन चरण ।
डोळ्यांनी पाहीन रुप तुझें ।
प्रेमें आलिंगन, आनंदे पूजिन ।
भावें ओवाळीन म्हणे नामा ।।१।।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बंधुक्ष्च सखा त्वमेव ।
त्वमेव विध्या द्रविणं त्वमेव ।
त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।२।।

कायेन वाचा मनसेंद्रीयेव्रा, बुद्धयात्मना वा प्रकृतिस्वभावात ।
करोमि यध्य्त सकलं परस्मे, नारायणायेति समर्पयामि ।।३।।

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं, जानकीनायकं रामचंद्र भजे ।।४।।

हरे राम हर राम, राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

श्लोक

व्रकतुंड महाकाय, सूर्यकोटी समप्रभाः |
निर्वघ्नं कुरु मे देव, सर्वकार्येरुषु सवर्दा ||

आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जा की पार्वती, पिता महादेवा ॥ जय गणेश देवा…

एकदन्त दयावन्त चार भुजाधारी
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी ।।

अन्धन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ।। जय गणेश देवा…

पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा ॥

‘सूर’ श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥

दोहा

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।
नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥
सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥

स्तुति

गणपति की सेवा मंगल मेवा सेवा से सब विध्न टरें।
तीन लोक तैंतीस देवता द्वार खड़े सब अर्ज करे ॥

ऋद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विरजे आनन्द सौं चंवर दुरें ।
धूप दीप और लिए आरती भक्त खड़े जयकार करें ॥

गुड़ के मोदक भोग लगत है मूषक वाहन चढ़े सरें ।
सौम्य सेवा गणपति की विध्न भागजा दूर परें ॥

भादों मास शुक्ल चतुर्थी दोपारा भर पूर परें ।
लियो जन्म गणपति प्रभु ने दुर्गा मन आनन्द भरें ॥

श्री शंकर के आनन्द उपज्यो, नाम सुमरयां सब विध्न टरें ।
आन विधाता बैठे आसन इन्द्र अप्सरा नृत्य करें ॥

देखि वेद ब्रह्माजी जाको विध्न विनाशन रूप अनूप करें।
पग खम्बा सा उदर पुष्ट है चन्द्रमा हास्य करें ।
दे श्राप चन्द्र्देव को कलाहीन तत्काल करें ॥

चौदह लोक में फिरें गणपति तीन लोक में राज करें ।
उठ प्रभात जो आरती गावे ताके सिर यश छत्र फिरें ।

गणपति जी की पूजा पहले करनी काम सभी निर्विध्न करें ।
श्री गणपति जी की हाथ जोड़कर स्तुति करें ॥

|| श्रीगजाननाष्टकम् ||

देवासुरमनुष्याद्यैः कार्यादौ यः स्मृतः सदा ।
विघ्नोपशमनार्थं तं वंदेऽहं विघ्ननायकम् ॥ १ ॥
सौंदर्योदार्यगांभीर्ययुतं यत्कामिनीद्वयम् ।
सिद्धिबुध्यभिदं पार्श्र्वद्वयेराजन् नमामि तम् ॥ २ ॥
यांञ्चा श्रोतुं शूर्पकर्णः सिद्धिं दातुं स सिद्धिकः ।
बुद्धिं दातुं बुद्धियुक्तो यस्तं वंदे गजाननम् ॥ ३ ॥
यत्पिता पंचवक्त्रोभूद्यद्भ्राता स षडाननः ।
स्वयमतद्वैतवदनो यतस्तं नौमि विघ्नपम् ॥ ४ ॥
भक्तभव्याभवासार्थं सिंदुरो यस्य च प्रियः ।
मोहदैत्यविनाशार्थं सांकुशो यो नमामि तम् ॥ ५ ॥
त्रिपुरध्वंसकाले यः शिवेनापि विचिंतितः ।
तं न स्मरति को भूमौ विघ्नराजं सुरार्चितम् ॥ ६ ॥
यत्स्मृतिर्विघ्नशमनी सर्वसिद्धिविधायिनी ।
तं न स्मरति को मर्त्यो विघ्नराजं गणेश्र्वरम् ॥ ७ ॥
यत्सद्गुणार्णवकणान्वक्तुं शेषोप्यशक्तधीः ।
तत्राहं तु क्रियान्मंदो यतस्तस्मै नमो नमः ॥ ८ ॥
यः प्रातः पठते मर्त्यो गजास्याष्टकमादरात् ।
तस्य विघ्नाः शमं यांति गजवक्त्रप्रसादतः ॥ ९ ॥
॥ इति श्रीगजाननाष्टकम् संपूर्णम् ॥